• छत्तीसगढ़ से लगी मध्य प्रदेश की सीमा के इस तपोस्थल पर तर्पण के लिए मेला
• अतुल कांत खरे
Pinddaan at Amarkantak : बिलासपुर (fourthline) l छत्तीसगढ़से लगी मध्य प्रदेश की सीमा पर स्थित पावन स्थल अमरकंटक में इन दिनों पितृ तर्पण के लिए मेला लगा हुआ है l छत्तीसगढ़ मध्य प्रदेश के अलावा उड़ीसा, बंगाल और राजस्थान से भी लोग आकर यहां पितरों को तृप्त कर रहे हैं l माना जाता है कि यह स्थान गयाजी की तुलना में कई गुना ज्यादा फलदायक होता है l स्कंद पुराण में भी इस स्थान की पवित्रता का उल्लेख मिलता हैl
Pind Daan at Amarkantak : पंडित श्रीराम तिवारी बताते हैं कि पौराणिक मान्यताओं के अनुसार अमरकंटक स्थित नर्मदा अरण्य नदी संगम पर किया गया पिंडदान गया जी की तुलना में 16 गुना अधिक फलदायी माना जाता हैl यही कारण है कि हजारों लोग यहां अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति और मोक्ष के लिए तर्पण करने आते हैं l पितृपक्ष के दौरान देशभर के लोग श्रद्धा तर्पण और पिंडदान कर रहे हैंl अमरकंटक में इन दिनों उड़ीसा, बंगाल और राजस्थान से भी लोग आ रहे हैं ताकि वह अपने पितरों को स्मरण कर उनका आशीष ले सकेंl इन दिनों गयाजी जाना और शांतिपूर्ण ढंग से तर्पण करना दुष्कर हो गया हैl गयाजी में भारी भीड़ होती है। अमरकंटक में नर्मदा सोन और जोहिला नदियों का उद्गम है। यहां बहुत ही शांतिपूर्ण ढंग से पितरों का पूरा काम हो जाता हैl नर्मदा अरण्य नदी संगम स्थल नर्मदा के उद्गम से मात्र डेढ़ किलोमीटर दूरी पर स्थित है l

स्कंद पुराण में है अमरकंटक का जिक्र
स्कंद पुराण में जिक्र मिलता है कि अमरकंटक में सती अनुसूया ने 100 वर्षों तक कठोर तपस्या की थी और संतान प्राप्ति की कामना की थी। उनके तप का ही फल था कि भगवान दत्तात्रेय का जन्म हुआl इस कारण यह स्थल उन निःसंतान दंपतियों के लिए भी विशेष फलदाई माना जाता है, जो संतान प्राप्ति की कामना करते हैंl श्री तिवारी बताते हैं कि अरण्य संगम को गुफा आश्रम के नाम से भी माना जाता है। योगीराज पंडित सीताराम महाराज ने इस गुफा में तपस्या की थी और भगवान श्री राम को प्रसन्न किया था l कहा जाता है कि 1969 में 160 वर्ष की आयु में उन्होंने देह त्याग किया। उनकी तपस्या और आशीर्वाद के कारण यह स्थल आज भी ध्यान साधकों के लिए के लिए शक्ति का केंद्र माना जाता है l

मनुष्य पर तीन प्रमुख ऋण
पंडित उत्कर्ष मिश्रा बताते हैं की अमरकंटक बहुत ही पावन स्थल हैl और यहां पितृपक्ष का किया गया सारा काम ज्यादा फलदायी है lउन्होंने बताया हिंदू शास्त्रों के मुताबिक प्रत्येक मनुष्य पर तीन प्रमुख ऋण होते हैं देव, ऋषि और पितृ ऋण। इनमें से पितृ ऋण को सर्वोपरि माना गया है! मान्यता है कि पितृ पक्ष में पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए तर्पण और पिंडदान करना अनिवार्य हैl ऐसा करने से पितृ प्रसन्न होकर अपने वंशजों को आशीर्वाद देते हैं और उनके जीवन से बाधाओ,रोग दुख और दरिद्रता को दूर करते हैंl
भगवान शिव के पसीने की बूंद से बना कुंड
पौराणिक कथाओं के अनुसार यह माना जाता है कि भगवान शिव के पसीने की बूंद से यहां एक कुंड बना जिसने बालिका रूप में माता नर्मदा प्रकट हुई थी मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की सीमा पर स्थित या तपोभूमि को पहले ऋषभ कहा जाता थाl इन दिनो इस पावन स्थल पर पितृ तर्पण के लिए मेला लगा हुआ है l

सनातन का तर्पण अत्यंत विराट
डॉ मनीष कुमार दीवान बताते हैं मोक्ष अनुष्ठान का अर्थ केवल क्रिया कर्म नहीं है बल्कि दिवंगत आत्माओं को उनके मोह, राग और अतृप्त इच्छाओं के बंधन से मुक्त कर परम शांति की ओर अग्रसर करना है। इसके लिए अमरकंटक एक आदर्श स्थान है ,जहां किया गया तर्पण गयाजी की तुलना में ज्यादा फलदायक होता है l उन्होंने बताया आज जहां हम हैं वहां हमारे पूर्वजों के त्याग तपस्या और संस्कारों की नीव पर ही खड़े हैंl सनातन का तर्पण अत्यंत विराट हैl यहां जैसे सूर्य प्रकृति के तत्व यहां तक की राक्षस से प्रेत की योनि में भटकने वाली शक्तियों को भी शांति का संदेश दिया जाता है।
प्रेम और कृतज्ञता मृत्यु की सीमाओं से परे
पंडित प्रमोद पाठक इस संदर्भ में बताते हैं कि विश्व की अल्प संस्कृतियों में मृत्यु के बाद अंत्येष्टि को अंतिम अध्याय माना जाता है lकिंतु सनातन धर्म में यह एक नए और सूक्ष्म संबंध की शुरुआत होती हैl यह इस बात का प्रमाण होता है कि प्रेम और कृतज्ञता मृत्यु की सीमाओं से परे हैl पंडित पाठक बताते हैं की बहुत से लोग गया जी को ही परिपूर्ण मानते हैं यह उनकी आस्था हो सकती है पर बिलासपुर से नजदीक अमरकंटक एक ऐसा स्थल है यहाँ पितरों का तर्पण परिपूर्ण माना जाता है l
अमरकंटक में 96 प्रकार का पिंडदान
अमरकंटक भारतवर्ष का अकेला स्थान है, जहां 96 प्रकार का पिंडदान किया जा सकता है l पंडित पाठक बताते हैं अमरकंटक ऐसी तपोस्थली है lजहां 12 प्रकार के श्राद्ध के अलावा 96 प्रकार का पिंडदान होता है l हिंदू धर्म ग्रंथो के अनुसार वर्षभर में श्रद्धा और तर्पण के कुल 96 पर्व बनाए गए हैं, जिन्हें कुल की परंपरा के अनुसार किया जाता हैl 12 अमावस्या, चार युगाड़ी तिथियां 14 मनु तिथियां 12 संक्रांतियां, 12 वैधिति पातयोग, पितृ पक्ष पक्ष पांच अषटका, अनवषटका का श्राद्ध, पांच अनुप्रस्थ श्राद्ध और पांच पुर्वेधु l पूरे भारतवर्ष में यह अकेला स्थान है ,जहां ये पूरी प्रक्रियाएं एक साथ हो सकती हैं l

