• अजय गुप्ता

सूरजपुर।  Companion of the Voiceless :  कुदरगढ़ धाम की पावन वादियों में जहां एक ओर मां के दरबार में श्रद्धालुओं की आस्था निरंतर उमड़ रही है, वहीं घने जंगलों में रहने वाले सैकड़ों बंदरों के प्रति एक आरक्षक का सेवा भाव मानवता की अनोखी मिसाल पेश कर रहा है।

Companion of the Voiceless :  वर्ष 2019 में जब कोरोना काल के चलते मंदिर में श्रद्धालुओं की आवाजाही लगभग थम गई थी, उस समय जंगलों में रहने वाले बंदर भोजन के लिए बेहद परेशान हो गए थे। इसी दौरान आरक्षक राजेश पटेल के मन में इन बेजुबानों के प्रति करुणा का भाव जागा। उन्होंने अपने स्तर पर फल, चना और अन्य खाद्य सामग्री की व्यवस्था कर बंदरों को खिलाना शुरू किया। धीरे-धीरे यह कार्य उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन गया।

Companion of the Voiceless :  कोरोना काल के कठिन दौर में जब पूरा धाम सूना पड़ा था, तब भी उनका यह सेवा भाव नहीं रुका। वे नियमित रूप से कुदरगढ़ पहुंचकर बंदरों को भोजन कराते रहे, जिससे एक भी दिन ये बेजुबान भूखे न रहें।वर्तमान में अन्य थाना में पदस्थ होने के बावजूद उनका यह समर्पण कम नहीं हुआ है। आज भी वे सप्ताह में एक-दो बार कुदरगढ़ धाम पहुंचते हैं। उनकी आवाज सुनते ही बंदरों के झुंड पास आ जाते हैं,यह दृश्य उनके और इन बेजुबानों के बीच बने गहरे अपनत्व को दर्शाता है।

Companion of the Voiceless :  जानकारी के अनुसार, कुदरगढ़ धाम क्षेत्र में लगभग 300 से 400 बंदर निवास करते हैं, जिनके लिए भोजन की व्यवस्था आसान नहीं है। ऐसे में आरक्षक राजेश पटेल का यह प्रयास निस्वार्थ सेवा और मानवीय संवेदनाओं का सशक्त उदाहरण बनकर सामने आया है।इतना ही नहीं वे हर वर्ष दीपावली के पावन अवसर पर मां के दरबार को 2100 दीपों से सजाते हैं। सीढ़ियों से लेकर मंदिर परिसर तक दीपों की श्रृंखला उनकी अटूट आस्था और समर्पण को जीवंत कर देती है जो श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण का केंद्र बनती है।यह पहल इंसानियत और जिम्मेदारी के भाव को मजबूत बनाते हुए दिखाती है कि छोटे-छोटे प्रयास भी बड़े बदलाव की प्रेरणा बन सकते हैं।

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