Karma 2026 : अम्बिकापुर। आदिवासी संस्कृति की खास पहचान है करमा पूजा। यह पर्व 22 सितंबर, मंगलवार को मनाया जायेगा। यह पर्व भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाया जाता है। करमा पूजा अच्छी फसल, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना से जुड़ी है। इस दिन करम देवता की पूजा की जाती है और करम वृक्ष की डाल को विशेष महत्व दिया जाता है। कई जगह महिलाएं और बहनें परिवार की खुशहाली और भाइयों की लंबी उम्र के लिए व्रत रखती हैं। पूजा के बाद गीत-संगीत और करमा नृत्य के साथ उत्सव मनाया जाता है।

 Karma 2026 : भाद्रपद शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि 21 सितंबर की रात 8 बजे शुरू होकर 22 सितंबर की रात 9:43 बजे तक रहेगी। करमा पर्व  छत्तीसगढ़, झारखंड,पश्चिम बंगाल, ओडिशा, बिहार और मध्य प्रदेश के आदिवासी समुदायों में  उतकरमा पर्व पर शक्ति, यौवन और कर्म के देवता माने जाने वाले करम देवता की पूजा की जाती है। इस अवसर पर करम वृक्ष की शाखा को लाकर आंगन में रोपा जाता है। इसे जीवन, शक्ति और पर्यावरण के प्रति सम्मान का प्रतीक माना जाता है। कई जगह बहनें अपने भाइयों की लंबी उम्र, सुख और समृद्धि की कामना से व्रत रखती हैं। करम वृक्ष प्रकृति और आदिवासी जीवन के गहरे संबंध को दर्शाता है।्साह के साथ मनाया जाता है।  

 Karma 2026 : करमा पूजा में करम देवता को अलग-अलग पारंपरिक सामग्री अर्पित की जाती है। इनमें खीरा, जाईं या जवा, फूल, अक्षत, धूप-दीप और देसी पकवान शामिल हैं।करम देवता को विशेष रूप से खीरा चढ़ाया जाता है। पूजा पूरी होने के बाद इसे प्रसाद के रूप में लोगों के बीच बांटा जाता है।सात प्रकार के अनाज, जैसे धान, गेहूं, मक्का और जौ आदि को टोकरी में उगाया जाता है। इसे जाईं या जवा कहा जाता है। इसे भी पूजा में अर्पित किया जाता है।करमा पूजा में धुस्का, अरसा, ठेकुआ, चावल की खीर और चना दाल की पकौड़ी जैसे पारंपरिक देसी पकवान बनाए जाते हैं।

Karma 2026 : करमा पूजा के बाद रातभर नृत्य करने की परंपरा प्रकृति, कर्म देवता को प्रसन्न करने, अच्छी फसल की कामना और सामाजिक-सांस्कृतिक एकता से जुड़ी मानी जाती है। इस दौरान गांव के लोग एक साथ मिलकर गीत गाते हैं और पारंपरिक वाद्ययंत्रों की धुन पर करमा नृत्य करते हैं। आदिवासी समाज में मान्यता है कि रातभर करम वृक्ष की डाल के चारों ओर मांदर और नगाड़ों की थाप पर नृत्य करने से भाग्य के देवता प्रसन्न होते हैं और आशीर्वाद देते हैं। इस परंपरा के जरिए करम देवता के प्रति श्रद्धा प्रकट की जाती है।

कर्मा-धर्मा की कथा और रातभर गीत

करमा पूजा की रात कर्मा-धर्मा की कथा सुनने के बाद अलग-अलग प्रहरों में गीत गाने की परंपरा भी है। आधी रात के ‘अधरतिया’ और सुबह के ‘भिनसरिहा’ गीतों के जरिए पूर्वजों की कहानियों और जीवन मूल्यों को अगली पीढ़ी तक पहुंचाया जाता है। इस तरह करमा पर्व केवल पूजा का अवसर नहीं है। यह प्रकृति, खेती, सामाजिक एकता, परंपरा और आने वाली पीढ़ी तक सांस्कृतिक मूल्यों को पहुंचाने से भी जुड़ा पर्व है।

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