• अतुल कांत खरे
Crows in Crisis : बिलासपुर (fourthline)। बिलासपुर एवं आसपास दूर-दूर तक इस बार कौवे नजर नहीं आए। लंबे समय से यहां दिखाई भी नहीं दे रहे हैं l
पितृपक्ष के दौरान श्राद्धकर्म का एक अहम हिस्सा माना जाता है कौवे को भोजन कराना, लेकिन पिछले 16 दिनों से कौवे के बजाय अन्य पक्षियों को भोजन कराकर लोगों ने अपना कर्म पूरा किया । हर घर में कौवे के लिए भोजन रखा गया, लेकिन वह किसी और जीव के हिस्से आया ।
बढ़ता शहरीकरण कटते पेड़
बिलासपुर में बढ़ता शहरीकरण कटते पेड़ों के कारण कौवे चील और गिद्ध अब नजर नहीं आते। इस संदर्भ में पंडित प्रमोद पाठक बताते हैं कौवौ को पितरों का प्रतिनिधि माना जाता है। हिंदू धर्म शास्त्रों में कौवे को यमराज का दूत बताया गया है। ऐसी मान्यता है पितृपक्ष के दौरान पूर्वज कौवे का रूप धारण करके धरती पर आते हैं और अपने वंशजों द्वारा दिया गया भोजन ग्रहण करते हैं। इसके पीछे रामचरितमानस की वह कथा भी जुड़ी है, जिसमें देवराज इंद्र के पुत्र जयंत ने कौवे का रूप लेकर माता सीता को ,चोच मारी थी। भगवान श्री राम ने उसे क्षमा करते हुए यह वरदान दिया था आगे से कौवे के माध्यम से दिया गया अन्न ही पितरों तक पहुंचेगा। इस वजह से कौवे को पितृ पक्ष में विशेष स्थान प्राप्त है।
बिगड़ते इको सिस्टम का असर
पक्षियों के जानकार डॉ. राहुल सिंह बताते हैं एक समय था जब बिलासपुर और आसपास घड़ी के अलारम से नहीं बल्कि मुंडेर पर बैठे कौवे की काव काव से सुबह होती थी। पहले बिलासपुर में इतने कौवे थे कि घर के आसपास उन्हें कपड़े झटक कर भगाने की स्थिति बनी रहती थी। कौवे को लेकर अलग-अलग मान्यताएं हैं। इन्हें मृत्यु रहस्य, बुद्धि स्मृति और दूरदर्शिता से भी जोड़ा गया है। स्टेट ऑफ़ इंडियास बर्ड्स की रिपोर्ट के अनुसार भारत में कौवे की दीर्घकालिक प्रवृत्ति स्थिर मानी गई है जबकि वार्षिक प्रवृत्ति में गिरावट दर्ज की गई है। अब शहरी इको सिस्टम कौवे के अनुकूल नहीं है। कौवे की अलग-अलग प्रजातियां हैं जो अब एक साथ नहीं रह सकते ।
कौवे ने मांगी थी भगवान राम से माफी
डॉ प्रभा व्यौहार बताती है की तुलसीदास रचित रामचरितमानस के अरण्यकांड में यह प्रसंग मिलता है की इंद्र के बेटे ने कौवे का रूप लेकर सीता माता के पैर में चोच मारी थी, जिससे उनके पैर से रक्त बहने लगा था। तब श्री राम ने एक तिनका जयंत की आंख में लगा दिया था। अपनी जान बचाने के लिए जयंत तीनों लोकों में भटकता रहा, लेकिन उसे कोई शरण नहीं मिली जब उसने श्री राम से माफी मांगी तब उसे वरदान मिला और वह मुक्ति पा सका।
पक्का शास्त्रीय आधार नहीं
इस संदर्भ में प्रोफेसर मनीष कुमार दीवान बताते हैं यह लोक मान्यता है, जिसे पीढ़ी दर पीढ़ी परिवारों में दोहराया जाता रहा है लेकिन इसका कोई पक्का शास्त्रीय आधार नहीं है ।यदि कौवा भोजन ग्रहण करे तो अत्यंत शुभ संकेत माना जाता है, लेकिन बिलासपुर एवं आसपास अब कौवा नहीं मिलने के कारण लोग कबूतर एवं अन्य पक्षियों को अनाज खिला देते हैं और श्रद्धा कर्म को पूर्ण कर लेते हैं।
तापमान बढ़ने से कौवों पर संकट
पक्षी विशेषज्ञ डॉ. अनूप सिंह एवं पर्यावरण विषयों के अच्छी जानकारी रखंने वाले अमित मिश्रा के अनुसार पहले बिलासपुर में अरपा नदी में सारे मृत पशुओं को फेंक दिया जाता था, जो पक्षियों का भोजन बनते थे। अरपा एवं आसपास कौवे, चील और गिद्ध मंडराते रहते थे। सन 1999 से अरपा नदी में मृत पशु फेंकने पर प्रतिबंध लगा गया इसलिए अरपा एवं आसपास कौवे, चील, गिद्ध दिखाई देने बंद हो गए। बिलासपुर के आसपास के थर्मल पावर संयंत्र के कारण यहां की गर्मी बढ़ी है और ऊपर की हवा नम नहीं है। यह कौवे के प्रतिकूल हो जाती है।
कुत्ते, गाय और चींटियों को खिलाने से भी तृप्ति
मिट्ठू पंडित के अनुसार गरुड़ पुराण में कुत्ते, गाय और चींटी जैसे जीवो को भी पितरों से जुड़ा हुआ बताया गया है। इसलिए यह तर्क दिया जाता है कि कौवा उपलब्ध न हो तो अन्य जीवों को भोजन अर्पित करके भी पितरों को तृप्त किया जा सकता है। आज पितृ पक्ष के अंतिम दिन बहुत से लोगों ने कबूतरों को भोजन कराकर यह कर्म पूरा किया ।

