
• बिलासपुर-रायपुर नेशनल हाइवे के लिए अधिग्रहित जमीन का मामला
नई दिल्ली। Supreme court : वर्ष 2012 से बिलासपुर-रायपुर फोर लेन और सिक्स लेन प्रोजेक्ट में सड़क किनारे की अपनी महंगी जमीन गंवा चुके किसानों को अंततः 14 साल की कानूनी लड़ाई के बाद उम्मीद दिखाई दे रही है। आज सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस दीपंकर दत्ता और जस्टिस सतीश शर्मा के खंडपीठ में हुई सुनवाई में नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एनएचएआई) की ओर से उपस्थित भारत सरकार के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि यह सही है कि मुआवजा वितरण में कुछ असंगति है, जिसमें सुधार की आवश्यकता है।
Supreme court : सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि हम छत्तीसगढ़ सरकार से भी बात कर रहे हैं और हमें अपनी बात रखने के लिए कुछ समय दिया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने उनके इस कथन को सुनकर समय देना स्वीकार कर लिया। इस स्तर पर याचिकाकर्ताओं की ओर से उपस्थित अधिवक्ता प्रणव सचदेवा और सुदीप श्रीवास्तव ने कहा कि यह मामला 12 साल से लंबित है और जो राज्य सरकार ने नया मार्गदर्शी सिद्धांत बनाया है, वह नए मामलों पर लागू होगा पुराने मामलों पर नहीं। साथ ही अन्य याचिकाकर्ता की तरफ से उपस्थित वरिष्ठ वकील अग्रवाल ने भी मामले को जल्दी हल किए जाने पर बल दिया।
Supreme court : सुप्रीम कोर्ट ने एनएचएआई और छत्तीसगढ़ सरकार के अधिवक्ता के कथनों को सुन कर इस विषय पर विचार करने का समय दिया। गौरतलब है कि इस मामले में 2012 से लगातार न्यायालय में केस चल रहे है। दो बार आर्बिट्रेटर और दो बार जिला जज और एक बार हाई कोर्ट में यह मुकदमा चल चुका है। इसी मामले के साथ जुड़े एक अन्य प्रकरण में हाई कोर्ट की दो खंडपीठों ने यह फैसला दिया है कि अधिक जमीन वाले को कम मुआवजा दिया जाना अनुचित है और जिस रेट पर अन्य किसानों छोटी जमीन का मुआवजा दिया गया है वैसे ही स्लैब के आधार पर बड़ी जमीनों वालों को भी देना चाहिए यदि उनकी जमीन भी सड़क के किनारे समान रूप से स्थित है।
Supreme court : प्रतिवादी एनएचएआई ने हाई कोर्ट खंडपीठ के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है वहीं याचिकाकर्ताओं ने दो बार आर्बिट्रेशन और दो बार डिस्टिक कोर्ट में सुनवाई हो जाने के बाद उन्हें पुनः आर्बिट्रेशन के लिए भेजे जाने के खिलाफ याचिका लगाई है। याचिका कर्ताओं का तर्क है कि दो ही रेट उपलब्ध है, जिनमें से एक को आर्बिट्रेटर डिस्टिक कोर्ट और हाई कोर्ट नकार चुका है। ऐसे में दूसरे उपलब्ध विकल्प के रेट पर ही मुआवजा तय होना है अतः किसी नए मुकदमे की जरूरत नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 17 मार्च को अंतिम रूप से करने का आदेश किया है।










