• अतुल कांत खरे
बिलासपुर (fourthline) । कभी बिलासपुर की पहचान रहे गंगा इमली के पेड़ विलुप्ति की ओर हैं। नियमित रोपण ना होने के कारण यह स्थिति आई है। सैकड़ो वृक्ष सड़क चौड़ीकरण की भेंट चढ़ गए। सिर्फ नजदीकी गांव में ही इक्का दुक्का पेड़ दिखाई देते हैं। एक समय मार्च खत्म होते ही बाजार गंगा इमली से लद जाते थे । अब किसी कहीं  फुटपाथ   दुकानों में गंगा इमली नजर आती है। बिलासपुर में अभी पान्डातराई और तखतपुर से गंगा इमली आ रही है ।

Ganga Tamarind :   गंगा इमली के पेड़ बहुत बड़े और कटीले होते हैं। इसके फल में प्रोटीन, वसा, कार्बोहाइड्रेट, कैल्शियम फास्फोरस , आयरन और थायमिन भरपूर मात्रा में पाया जाता है इसलिए इसे अमृततुल्य भी माना जाता है । कृषि विशेषज्ञ डॉ, ए पी अग्रवाल बताते हैं – अत्यधिक कटीला होने के कारण इसका रोपण कम  होता है। फिलहाल शासकीय या अशासकीय किसी भी तोर पर इसका रोपण नहीं हो रहा है। यह सिर्फ अपने स्वपरागण के दम पर जीवित है ।बिलासपुर के नजदीकी गांव में स्वपरागण से ही इसका विकास हो रहा है।

Ganga Tamarind :  बिलासपुर में कलेक्ट्रेट से लेकर मुंगेली रोड तक पहले बहुतायत् से गंगा इमली के पेड़ थे, जो सड़क चौडीकरण की भेंट चढ़ चुके हैं। तखतपुर मुंगेली और पांडातराई में इसके अभी काफी पेड़ हैं और वहीं से गंगा इमली की आवक हो रही है। श्री अग्रवाल बताते हैं कि इसे जंगल जलेबी भी कहा जाता है। छत्तीसगढ़ में यह सर्वाधिक बस्तर में होती है। प्रारंभ में हरे रंग की दिखाई देने वाला इसका फल यह बाद में गुलाबी रंग में बदल जाता है और जलेबी का आकार ले लेता है। छत्तीसगढ़ में इसे कच्चा  और चटनी बनाकर दोनों ही प्रकार से खाया जाता है। कुछ लोग इसे दाल में भी मिलाकर खाते हैं ।

आयुर्वेदिक महत्व

गंगा इमली त्वचा रोग और मधुमेह में बेहद कारगर है। इसके पेड़ की छाल में मधुमेह को नियंत्रित करने वाले तत्व होते हैं इसलिए मधुमेह बनाने वाले पाउडर में इसे मिलाया जाता है। डॉ के  के जायसवाल  ने बताया कि इसकी छाल का उपयोग  त्वचा रोग के मलहम में भी किया जाता है ।

पहले थी बहार 

कृषि विशेषज्ञ डॉ, बी बी बयौहार बताते हैं- बिलासपुर में तीन दशक पहले गंगा इमली की बहार थी। सड़क के किनारे सैकड़ो गंगा इमली के पेड़ हुआ करते थे । अब इसका रोपण नहीं होता है इसलिए यह विलुप्त की ओर है। ‌इसे बचाए रखने के लिए समन्वित प्रयासों की जरूरत है। शासन को भी आगे आना होगा । साथ ही पर्यावरणप्रेमियों को भी इसमें दिलचस्पी लेनी होगी अन्यथा एक समय ऐसा आएगा कि बिलासपुर की यह पहचान कहीं लुप्त हो न हो जाए ‌।

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