• ओड़िशा के गंगाधर मेहेर विश्वविद्यालय में
छत्तीसगढ़ और ओड़िशा की सांस्कृतिक विरासत ;
‘ नाट्य कला में रामकथा’ पर राष्ट्रीय संगोष्ठी
National Seminar on Ramkatha : रायपुर। पड़ोसी राज्य ओड़िशा के सम्बलपुर में गंगाधर मेहेर विश्वविद्यालय, सम्बलपुर के हिंदी विभाग में ‘ओड़िशा की अमूर्त विरासत में रामायण परम्परा ’ विषय पर कल 12 अक्टूबर को एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी में रामायण परम्परा , लोकनाट्य और छत्तीसगढ़ तथा ओड़िशा की साझा सांस्कृतिक विरासत के विभिन्न पहलुओं पर गहन चर्चा हुई।
National Seminar on Ramkatha : संगोष्ठी में छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ साहित्यकार, रायपुर जिले के अभनपुर निवासी आचार्य ललित मुनि भी आमंत्रित थे । प्रथम सत्र में उनका व्याख्यान हुआ। संगोष्ठी की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. व्योमकेश त्रिपाठी ने की । उन्होंने उपस्थित विद्वानों का शाल एवं टगर के पौधे देकर सम्मान किया। सेवानिवृत्त प्रोफेसर प्रो. कुमुद रंजन पाणिग्रही मुख्य अतिथि तथा वरिष्ठ पत्रकार हेमंत महापात्र विशिष्ट अतिथि थे।
ओड़िया रामलीला और बस्तर का भतरा नाट
आचार्य ललित मुनि ने ‘छत्तीसगढ़ और ओड़िशा की सांस्कृतिक विरासत : नाट्यकला में रामकथा’ विषय पर अपने व्याख्यान में कहा कि छत्तीसगढ़ में रामलीला की दो प्रमुख धाराएँ उत्तर भारत और ओड़िशा से आई दिखाई देती हैं। यहाँ की लोक संस्कृति ने दोनों परम्पराओं को अपनाकर विशिष्ट स्वरूप दिया है। रायगढ़ जिले के पुसौर की ओड़िया रामलीला और बस्तर का भतरा नाट इस सांस्कृतिक आदान-प्रदान के उल्लेखनीय उदाहरण हैं।आचार्य ललित मुनि ने बताया कि पुसौर की रामलीला आज भी ओड़िया भाषा में होती है। इसकी शुरुआत एक स्थानीय व्यापारी की कटक में रामलीला देखने के बाद उसे अपने गाँव में शुरू करने की पहल से जुड़ी है।
सिहावा की अनूठी परम्परा
आचार्य ललित मुनि ने कहा कि इसी तरह बस्तर के भतरा नाट में रामकथा के प्रसंग स्थानीय भाषा, गायन और मंचन शैली के साथ प्रस्तुत किए जाते हैं। उन्होंने छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले के सिहावा की अनूठी परम्परा का भी उल्लेख किया और बताया कि यहाँ मिट्टी से सहस्रबाहु रावण की प्रतिमा बनाई जाती है और देवी के खड्ग से उसका वध किया जाता है। इसके बाद लोग उस मिट्टी को घर ले जाकर तिलक लगाते हैं। बालोद जिले के बेलौदी गाँव की महिला रामलीला का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि वर्ष 2020 में उनके निर्देशन में महिलाओं ने अयोध्या के दीपोत्सव में सभी पात्रों की भूमिका निभाई। यह लोक परम्परा के विस्तार का उदाहरण है।
दस्तावेजी प्रमाणों के संकलन पर बल
आचार्य ललित मुनि ने कहा कि छत्तीसगढ़ और ओड़िशा के बीच प्राचीन काल से सामाजिक एवं सांस्कृतिक आदान-प्रदान होता रहा है। रामलीला की स्थानीय परम्पराएँ बताती हैं कि सांस्कृतिक धारा को छत्तीसगढ़ ने अपनी भाषा, लोक और रीति-रिवाजों के साथ जोड़कर नया स्वरूप दिया। आचार्य ने इन परम्पराओं के संरक्षण के लिए पुरानी पांडुलिपियों और संवादों के अभिलेखीकरण, विस्तृत अध्ययन तथा दस्तावेजी प्रमाणों के संकलन पर बल दिया।

