• अतुल कांत खरे
Art of Impersonation : बिलासपुर (fourthline) । कभी बिलासपुर और आसपास के ग्रामीण क्षेत्र की पहचान रही बहरूपिया कला अब विलुप्त होने की ओर है। एक समय यहां 10 से ज्यादा परिवार इस कला को पूरे वर्ष भर जीवित रखने थे आज सिर्फ दो परिवार रह गए हैं वह भी मूलतः कर्नाटक के हैं और गर्मी के दिनों में अपने गांव चले जाते हैं ।
आधुनिक मनोरंजन ने सब बदल दिया
ग्रामीण लोक कला जीवन में लोक व्याप्त रही बहरूपिया विद्या का धीरे-धीरे विलुप्त हो रही है । आधुनिक मनोरंजन के उपकरणों और उनकी सहज उपलब्धता ने जनरुचि को बदल दिया है, जिससे इन लोक कलाकारों का सका संकट बढ़ गया है । बिलासपुर में कर्नाटक से आए निषाद परिवार ने अब तक इस कला को संजो रखा है। रेलवे परिक्षेत्र में रहने वाला नारायण परिवार नए स्वांग रचकर लोगों का मनोरंजन करता है । दिवाली के समय ये दोनों परिवार इस कला का प्रदर्शन करते हैं। दिवाली में थोड़ी आय हो जाती है, लेकिन अब घर-घर घूमने के बजाय अब यह व्यावसायिक क्षेत्र में जा रहे हैं और दुकानदारों की डिमांड पर नृत्य भी करते हैं । 90 के दशक में बिलासपुर में काफी बहरूपिये थे। स्थानीय बहरूपिया नाचा गम्मत, रामलीला में व्यस्त हो गए इसलिए स्थानीय कलाकार अब यह काम नहीं करते।
कला को जीवित रखने की कोशिश
मूलत: दक्षिण भारतीय लोग ही इस कला को बिलासपुर में जीवित रखे हुए हैं । ये भगवान शंकर ,कृष्ण , हनुमान , यमराज, रावण, शनिदेव, काली माता बनाकर घूमते हैं । साथी कलाकार उनके परिवार के ही बच्चे पार्वती देवी दुर्गा आदि भी बनते हैं । कुछ समूह में महिलाएं भी शामिल होती हैं और मौके पर गीत भी सुनाती हैं। इनके साथ वाद्य कलाकार भी होते हैं जो हारमोनियम ढोलक खंजरी और मंजीरा बजाते हैं और भजन शैली में गायन करते हैं । इनको देखकर भीड़ इकट्ठी हो जाती है। अपना गुजारा चलाने के लिए ये लोग रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड के पास रहते हैं और समय देखकर ट्रेन के अंदर भी अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं । वर्तमान में बाहुबली कटप्पा गब्बर सिंह जैसे किरदार भी रखे जा रहे हैं जिन्हें प्रशंसा मिलती है I
नई पीढ़ी मुंह मोड़ रही
बहरूपिया कलाकार सुंदर नारायण बताते हैं कि वह बिलासपुर में सन 2005 में आए थे। बीच-बीच में वह अपने मूल गांव कर्नाटक चले जाते हैं, फिर यहां आकर अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं । उनका पूरा परिवार यहीं बस गया है। उनके बच्चे अब यह काम करना नहीं चाहते। वे आय के दूसरे साधन खोज रहे हैं । बहरूपिया कला इस समय अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रही है और इनका गुजारा मुश्किल हो रहा है।
भारत की प्राचीन कला
बिलासपुर में अब तक बहुत से बहुरूपियों का मेकअप कर चुके वरिष्ठ रंगकर्मी उमाकांत सर बताते हैं – बहुरूपिया कला भारत की एक अत्यंत प्राचीन, समृद्ध और जीवंत लोक कला है। यह कला ‘स्वांग रचने’ या ‘प्रतिरूपण’ पर आधारित है, जिसमें एक ही कलाकार अपनी वेशभूषा, भाषा, हाव-भाव और सटीक अभिनय के बल पर अनेक प्रकार के चरित्रों का रूप धारण करता है।’बहुरूपिया’ शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के दो शब्दों—’बहु’ (अनेक) और ‘रूप’ (चेहरा या आकृति) के मेल से हुई है। बहुरूपिया वह कलाकार है जो दर्शकों का मनोरंजन करने के लिए समय-समय पर भिन्न-भिन्न रूपों को धारण करता है। इस कला की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें कोई आधुनिक रंगमंच या विशेष तकनीकी तामझाम नहीं होता; कलाकार सड़क, चौपाल या गलियों को ही अपना मंच बना लेता है।
भरतमुनि के नाट्यशास्त्र में वर्णन
बहुरूपिया कला का इतिहास सदियों पुराना है।पौराणिक संदर्भ: भारतीय पौराणिक ग्रंथों तथा महाभारत में भी रूप बदलने (छलिया रूप) के प्रसंग मिलते हैं। भरतमुनि के ‘नाट्यशास्त्र’ में वर्णित ‘आहार्य अभिनय’ (वेशभूषा और सज्जा द्वारा पात्र में बदलना) को इस कला का मूल माना जाता है। मध्यकाल में, विशेष रूप से राजस्थान (जयपुर, मेवाड़, मारवाड़) की रियासतों और मुगल दरबारों में इन कलाकारों को बहुत सम्मान प्राप्त था। बिलासपुर के वरिष्ठ बहरूपिया कलाकार गोपाल निषाद बताते हैं कि उनका परिवार पिछले 20 वर्षों से यह काम कर रहा है जिसमें लाल निषाद गोविंद निषाद और छोटा बेटा हर्ष है।
बहुरूपिया स्वयं में लेखक , अभिनेता
एक कुशल बहुरूपिया स्वतः ही एक लेखक, निर्देशक, मेकअप आर्टिस्ट और अभिनेता होता है। वे मुख्य रूप से किरदारों का स्वांग रचते हैं।अपनी रूप सजजा वे स्वयं कर लेते हैं धार्मिक व पौराणिक पात्र: हनुमान, शिव, काली माता, साधु-संत या नारद मुनि। पुलिसकर्मी, सेठ-बनिया, डाकिया, फकीर, राजा या कोई पागल व्यक्ति बिलासपुर में कटप्पा गब्बर सिंह और फिल्म पुष्पा में बने अल्लू अर्जुन के काली वाले किरदार को यहां बहुत पसंद किया जाता है। इन कलाकारों का अभिनय इतना जीवंत और स्वाभाविक होता है कि लोग अक्सर धोखा खा जाते हैं। वर्तमान स्थिति में विलुप्ति का संकट है।
कला के कद्रदान हुए कम
कलामर्मज्ञ डॉ, प्रभा व्यौहार के अनुसार कभी भारतीय लोकजीवन में मनोरंजन और सामाजिक संवाद का मुख्य जरिया रही यह कला आज विलुप्ति की कगार पर है। टेलीविजन, इंटरनेट, सोशल मीडिया और सिनेमा के इस आधुनिक दौर में बहुरूपिया कलाकारों के कद्रदान लगातार कम हो रहे हैं। आर्थिक तंगी और सामाजिक उपेक्षा के कारण इन कलाकारों की नई पीढ़ी इस काम से मुंह मोड़ रही है और आजीविका के लिए मजदूरी या अन्य कार्यों पर निर्भर हो रही है। भारत के कई हिस्सों में अब यह कला केवल कुछ चुनिंदा त्योहारों या मेलों तक ही सिमट कर रह गई है।
बहुरूपिया कला हमारी धरोहर
बहुरूपिया कला केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक विरासत और लोक इतिहास की धरोहर है। यद्यपि इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (IGNCA) जैसी संस्थाएं समय-समय पर ‘राष्ट्रीय बहुरूपिया महोत्सव’ आयोजित कर इसे मंच प्रदान करती हैं, परंतु इस कला को जीवित रखने के लिए सरकारी स्तर पर कलाकारों को नियमित वित्तीय सहायता, पेंशन और छत्तीसगढ़ सरकार से लाभ मिलना चाहिए । बहरहाल, इन कलाकारों का संघर्ष जारी है

