Dhanteras and culture : बिलासपुर (fourthline )। धनतेरस पर बाजार में तरह-तरह का सूता आ गया है, जिसमें इस बार बहुत ही कलात्मक डिजाइन भी देखने मिल रही है । छत्तीसगढ़ में धनतेरस का त्योहार पारंपरिक उल्लास, स्थानीय संस्कृति और लोक मान्यताओं के अनोखे संगम के साथ मनाया जाता है। छत्तीसगढ़ एक कृषि प्रधान (agrarian) राज्य है इसलिए यहाँ धनतेरस और दीपावली (जिसे स्थानीय भाषा में ‘देवारी तिहार’ या ‘सुरहुत्ती तिहार’ कहा जाता है) मनाने का तरीका बेहद अनूठा और खास है।
धान के दाने चुगती हैं चिड़ियां, मां लक्ष्मी होती हैं प्रसन्न
यहाँ धनतेरस मुख्य रूप से परंपराओं के साथ मनाया जाता है। यहां धान की झालर लगाने की अनूठी परंपरा है। छत्तीसगढ़ में धनतेरस के दिन अपने घरों के मुख्य द्वारों पर धान की झालर (बालियों से बनी कलात्मक माला या ‘सूता’) लटकाने की बहुत पुरानी और खास सांस्कृतिक परंपरा है। इस समय खेतों में नई फसल पककर तैयार हो जाती है। लोग धान की नई नर्म बालियों से सुंदर झालर बनाकर मुख्य द्वार पर सजाते हैं। माना जाता है कि जब चिड़ियाँ आकर इन दानों को चुगती हैं, तो घर में सुख, समृद्धि आती है और माँ लक्ष्मी प्रसन्न होकर घर में प्रवेश करती हैं।
बाजारों में खरीदारी की रौनक
देश के अन्य हिस्सों की तरह छत्तीसगढ़ के शहरों जैसे रायपुर का गोल बाजार,बिलासपुर का सदर और ग्रामीण इलाकों के बाजारों में धनतेरस पर भारी भीड़ और रौनक देखने को मिलती है।
सोना, चांदी और बर्तन की खरीदारी
इस दिन सोने-चांदी के आभूषण, सिक्के और पीतल या स्टील के नए बर्तन खरीदना बेहद शुभ माना जाता है। बिलासपुर की इंटीरियर जानकार शोभा श्रीवास्तव बताती हैं – परंपरागत झाड़ू के साथ-साथ वास्तु के मुताबिक डिजाइनर झाड़ू भी बिलासपुर में पसंद की जाती है प्लास्टिक के साथ-साथ सोने और चांदी के रंग वाली झाड़ू भी इस बार बाजार में आई है ।
झाड़ू खरीदने का विशेष महत्व
धनतेरस पर नई झाड़ू खरीदने का विशेष महत्व है। घर लाकर झाड़ू की रोली और हल्दी से पूजा की जाती है, जिसे दरिद्रता दूर करने और लक्ष्मी आगमन का प्रतीक माना जाता है।बिलासपुर में इस बार विविध प्रकार की झाड़ू देखना मिल रही है । बिलासपुर में यह पहली बार है जब सुनहरी और चांदी के रंग से सजी हुई छोटी-छोटी झाड़ू आई है ।इस केअतिरिक्त सर्राफा बाजार में सोने की कोटिग और चांदी की छोटी शुद्ध झाड़ू आई है जिसकी कीमत 10 से 2000 हजार के बीच है ।



