Bilaspur traffic : बिलासपुर। इस शहर की यातायात व्यवस्था यूं तो अरसे से सवालों के घेरे में है, लेकिन त्यौहारी सीजन में जब बाजारों में भीड़भाड़ ज्यादा है, लोग जाम में फंस रहे हैं। इस जाम से राहत दिलाने की कोशिश करती हुई पुलिस कहीं दिखाई नहीं दे रही है। मानों कुछ किया ही नहीं जा सकता। शहर में यह समस्या समय के साथ बढ़ती ही जा रही है, लेकिन समाधान की कोई योजना स्थानीय स्तर पर किसी के पास है और न ही सरकार के पास ही है।
Bilaspur traffic : यह तस्वीर शाम पौने छह बजे की है। सदर बाजार रोड में लगे इस जाम से निकलने की कोशिश में में लोग परेशान थे। पुलिस वहां मौजूद नहीं थी। लोग जिधर से पा रहे थे, घुसते जा रहे थे। कुछ क्षण के लिए लगा कि लोगों में झगड़े न शुरू हो जाएं। हर कोई जाम से निकलने की कोशिश कर रहा था, लेकिन जगह नहीं थी। लोगों का सब्र जवाब दे रहा था। कुछ लोग सामने आए और किसी तरह जाम में फंसे लोग निकल सके। शहरी व्यवस्था में एक अच्छा काम हो जाएं तो उसका श्रेय लेने की होड़ शुरू हो जाती है, परन्तु रोज लोगों को जिन समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है, उन पर कोई कुछ नहीं कहता। इस शहर में बढ़ती बंदइंतजामी की सबसे बड़ी वजह यही है।
क्या है शहर का मास्टर प्लान ?
शहर के मास्टर प्लान की बात कई बार होती है। इस प्लान को धरातल पर उतारने की कोशिश होती हुई दिखाई नहीं देती। वर्षों हो गए पूरा शहर पांच किलोमीटर के दायरे में चार प्रमुख सड़कों पर सिमट कर रह गया है जबकि शहर का विस्तार चारों ओर 20 किलोमीटर तक हो चुका है। अगर मास्टर प्लान पर काम हुआ होता तो इस शहर की ऐसी हालत नहीं होती। पिछले दस वर्षों में शहर के विकास तथा नागरिक सुविधाओं पर एक भी उल्लेखनीय कार्य नहीं हुआ। रेलवे ओवरब्रिज इतने संकरे साबित हो रहे हैं कि वहां भी जाम लगने लगा है। कोई वैकल्पिक मार्ग भी नहीं है।
यहां के नेताओं का सपना नहीं !
अगर यही हाल रहा तो लोग घरों से निकलने से पहले यह सोचने पर मजबूर हो जाएंगे कि घर से निकल तो रहे हैं, पता नहीं कब तक लौट पाएंगे। ट्रेन और फ्लाइट पकड़ने वाले अभी से एक घंटे का समय रखकर चलने लगे हैं। केन्द्रीय राज्य मंत्री तोखन साहू ने शहर को कुछ सपने जरूर दिखाएं हैं। ये साकार कब तक होंगे , कुछ कहा नहीं जा सकता। बाकियों का हाल तो यह है कि उनका कोई सपना ही नहीं है। यहां के लोगों को अब तो नेताओं की बातों पर भरोसा भी नहीं होता। 120 फीट की सड़क बनाने की बात की जाती है और जब बनाने की सरकारी मंजूरी होती है तो वह 40 फीट की हो जाती है। ऐसा इसलिए हो जाता है क्योंकि अधिग्रहित जमीन का मुआवजा देने के लिए सरकार के खजाने में पैसे कम हो जाते हैं। शहर के नेता चुप रह जाते हैं।
स्ट्रीट लाइट तक नहीं जल रही
इस शहर में सुगम यातायात की ही समस्या नहीं है बल्कि ऐसी कई समस्याएं हैं, जिनका समाधान ढूंढने में देरी की गई तो लोगों की मुश्किल बढ़ती जाएगी। हालत यह है कि जो काम हो सकता है , वह भी ठीक से नहीं हो रहा है। जो समस्या लोगों को है वह उन्हें तो दिखाई देना ही चाहिए जो यही देखने की पगार लेते हैं। दुर्भाग्य से इस शहर में यह भी नहीं हो रहा है। शहरभर में कई जगह स्ट्रीट लाइट तक बंद रहती है। यहां तक कि पुलों पर लगी लाइट तक नहीं जल रही है।

