• राज्य सरकार ने याचिका वापस लेने की बात कही, याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने कहा – चाहते हैं निर्णय


Chhattisgarh high court: बिलासपुर । छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में करीब 3 साल बाद राज्यपाल द्वारा विधानसभा से पारित विधेयकों को रोकने मामले में दायर याचिका पर सुनवाई हुई। 2019 से 2023 के बीच छत्तीसगढ़ विधानसभा  में तत्कालीन कांग्रेस सरकार द्वारा पारित कई विधेयकों को राज्यपाल ने मंजूरी देने की बजाय बिना किसी निर्णय के रोके रखा।  विधेयकों को रोकने के खिलाफ आदिवासी कार्यकर्ता संत कुमार नेताम ने विधेयकों विशेष कर राज्य में आरक्षण बढ़ाने वाले विधेयक को रोकने के खिलाफ  याचिका दायर की थी।

Chhattisgarh high court:   जस्टिस ए के प्रसाद के सिंगल बेंच में सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट में राज्य सरकार की ओर से उपस्थित महाधिवक्ता विवेक शर्मा ने कहा कि राज्य सरकार यह याचिका वापस लेना चाहती है। इसके लिए विधिवत आवेदन देने हेतु उसे समय चाहिए। दूसरी ओर संत कुमार नेताम की ओर से उपस्थित अधिवक्ता सुदीप श्रीवास्तव ने हाईकोर्ट को बताया कि सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के फैसले के अनुसार किसी भी विधेयक, जो विधानसभा में पास हो गया है, उसे राज्यपाल बिना निर्णय के लंबे समय तक रोक नहीं सकते इसलिए वे अपनी याचिका वापस नहीं ले रहे हैं और पास विधेयकों पर निर्णय चाहते हैं।

Chhattisgarh high court:  गौरतलब है कि संत कुमार नेताम ने अपनी याचिका में छत्तीसगढ़ विधानसभा द्वारा पारित उस विधेयक को जिसमें आरक्षण में वृद्धि की गई है विशेष रूप से मंजूरी की मांग की है । सुनवाई के दौरान जस्टिस प्रसाद ने राज्य सरकार को याचिका वापस लेने के लिए विधिवत आवेदन देने के लिए दो सप्ताह का समय प्रदान किया है । इसके बाद इस मामले पर आगे सुनवाई की जाएगी।  बेंच ने याचिकाकर्ता को सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के फैसले की प्रति प्रस्तुत करने को कहा है।

Chhattisgarh high court: गौरतलब है कि 2018 से 2023 के बीच तत्कालीन कांग्रेस  सरकार के समय पारित कई विधेयक जिनमें एक विधेयक में कुशा भाऊ ठाकरे विश्वविद्यालय का नाम बदलकर चंदूलाल चंद्राकार विश्वविद्यालय करना भी शामिल था को राज्यपाल  द्वारा मंजूरी नहीं दी गई थी। पारित विधेयकों को रोकने के मामले कई अन्य राज्यों में भी हुए थे तब सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने इस मसले को अपने हाथ में लिया था। पिछले साल सितंबर में हुई लंबी सुनवाई के बाद जो फैसला दिया कि  राज्यपाल विधानसभा में पास विधेयक को असीमित काल के लिए नहीं रोक सकते बल्कि उस पर कोई ना कोई फैसला उन्हें लेना ही होगा ।

Chhattisgarh high court:  राज्यपाल के इन फैसलों में विधेयकों को पुनः विधानसभा को विचारार्थ भेजना या राष्ट्रपति को विचारार्थ भेजना शामिल है। संविधान के अनुच्छेद 200 के अनुसार यदि वापस भेजे गए विधेयक को विधानसभा पुनः पास कर देती है कब राज्यपाल को उन्हें रोकने का अधिकार नहीं होगा। संविधान पीठ ने किसी राज्य में लंबा समय बीत जाने के बाद भी पास विधेयकों पर कोई फैसला न होने पर पीड़ित पक्षों को याचिका लगाने की स्वतंत्रता दी है। गौरतलब है कि जब तक विधानसभा के द्वारा पारित विधेयक को राज्यपाल की मंजूरी नहीं मिलती तब तक वह कानून नहीं बन पाता क्योंकि प्रजातंत्र में मूल शक्ति निर्वाचित व्यक्तियों के पास है अतः विधानसभा से पारित विधेयक को मानमाने तरीके से रोका जाना गलत है।

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