Narak Chouthas : बिलासपुर (fourthline ) । दीपावली के 5 दिवसीय त्यौहार के दूसरे दिन आज नरक चौदस मनाई जा रही है,जिसमें छत्तीसगढ़ की परंपरा के अनुसार अनरसा ,ठेठरी और खुरमी बनाई जाती है। ग्रामीण क्षेत्रों में नए चावल का चीला भी बनाया जाता है ।
छत्तीसगढ़ में दीपावली के पांच दिवसीय उत्सव के दौरान दूसरे दिन मनाए जाने वाले त्योहार को स्थानीय भाषा में ‘यम चौदस’ या ‘छोटी दिवाली’ (नरक चतुर्दशी) कहा जाता है। यहाँ इस पर्व को पारंपरिक और ग्रामीण मान्यताओं के साथ बड़े ही उत्साह और अनूठे लोक ढंग से मनाया जाता है। छत्तीसगढ़ में नरक चौदस मनाने के मुख्य पारंपरिक तरीको में ठेठरी, खुरमी और अनरसा बनाना भी प्रमुख है।
उबटन और अभ्यंग स्नान
सूर्योदय से पूर्व स्नान होता है। छत्तीसगढ़ के ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी के दिन सूर्योदय से पहले उठने का नियम है।
सरसों तेल और पीठी
कला और परम्परा की जानकार ध्रुति श्रीवास्तव के मुताबिक़ इस दिन शरीर पर सरसों का तेल या हल्दी-जड़ी-बूटियों से बना विशेष उबटन (पीठी) लगाया जाता है। मान्यता है कि ऐसा करने से शरीर की नकारात्मक ऊर्जा और दरिद्रता दूर होती है तथा स्वास्थ्य एवं रूप (सौंदर्य) की प्राप्ति होती है। इसे स्थानीय लोग ‘रूप चौदस’ के रूप में भी देखते हैं।
यम दीपदान और चौमुखा दीया
छत्तीसगढ़िया संस्कृति में इस दिन शाम के समय यमराज (मृत्यु के देवता) के निमित्त दीपदान करने की विशेष परंपरा है। डॉ सोमनाथ यादव बताते हैं चौमुखा दीया घर के मुख्य द्वार पर लगाने की परंपरा है। मिट्टी का एक बड़ा चार बत्तियों वाला (चौमुखा) दीपक जलाकर रखा जाता है। इस दीपक का मुख दक्षिण दिशा की ओर किया जाता है, जिसे यम की दिशा माना जाता है। घर के बुजुर्ग इस दीपक को रखते हैं ताकि परिवार को अकाल मृत्यु के भय से मुक्ति मिले।
14 दीए जलाने का नियम
नरक चौदस के नाम पर घर के अलग-अलग कोनों, जैसे बाड़ी (बगीचा), कोठार (धान रखने की जगह), और तुलसी चौंरा के पास कुल 14 मिट्टी के दीये जलाए जाते हैं। मान्यता है कि इन दीयों को रखने के बाद पलटकर पीछे नहीं देखा जाता।
धान की कोठी और कोठार की सफाई
चूंकि छत्तीसगढ़ एक कृषि प्रधान राज्य है, इसलिए दीपावली के इन दिनों में किसान अपने कोठार (खलिहान) और धान की कोठियों को विशेष रूप से साफ करते हैं। नरक चौदस के दिन घर के कचरे और अनुपयोगी सामानों को बाहर निकाला जाता है, जिसे ‘अलक्ष्मी विसर्जन’ (दरिद्रता को घर से बाहर निकालना) माना जाता है, ताकि अगले दिन महालक्ष्मी का शुद्ध वातावरण में आगमन हो सके।
गौ-धन और देवारी गीत की तैयारी
प्रोफेसर मनीष कुमार दीवान बताते हैं नरक चौदस की रात से ही गांवों में ‘राउत नाचा’ और ‘देवारी गीत’ (दोहे) की गूंज शुरू हो जाती है। यादव (राउत) समाज के लोग रंग-बिरंगी पारंपरिक वेशभूषा पहनकर लाठियों के साथ नृत्य का अभ्यास अंतिम रूप से पूरा करते हैं। क्योंकि इसके ठीक बाद गोवर्धन पूजा (मातर) के दिन उनका मुख्य प्रदर्शन होता है। इस दिन शाम को पशुधन (गाय-बैलों) के पैरों को धोया जाता है और उन्हें अगले दिनों की पूजा के लिए तैयार किया जाता है।



