CG High Court: बिलासपुर। जमीन खरीद-बिक्री से जुड़े एक अहम मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने राजस्व और सिविल कोर्ट की शक्तियों की सीमा तय कर दी है। जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की सिंगल बेंच ने कहा कि कलेक्टर या तहसीलदार जैसे राजस्व अधिकारी नामांतरण सही है या नहीं और भू-राजस्व संहिता की धारा 165 के नियमों का पालन हुआ या नहीं, इसकी जांच तो कर सकते हैं, लेकिन किसी रजिस्टर्ड दस्तावेज को अवैध या शून्य घोषित करने का उन्हें कोई हक नहीं है।

CG High Court:  कोर्ट ने भास्करपारा कोल कंपनी लिमिटेड के अफसर संजीव शर्मा और जतिन भावसार की याचिका पर सुनवाई करते हुए 26 नवंबर 2012 को सरगुजा कलेक्टर द्वारा पारित आदेश के उस हिस्से को रद्द कर दिया जिसमें 16 सितंबर 2010 की रजिस्ट्री को अमान्य बताया गया था। कंपनी ने इस आदेश के खिलाफ राजस्व मंडल में अपील की थी, जिसे 12 मार्च 2015 को खारिज कर दिया गया था।

हाईकोर्ट ने क्या कहा –

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि संपत्ति पर मालिकाना हक किसका है और रजिस्टर्ड सेल डीड वैध है या नहीं, यह तय करना सिविल कोर्ट का काम है। राजस्व प्रक्रिया और दस्तावेज की वैधता दो अलग-अलग कानूनी बिंदु हैं।कोर्ट ने याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए मामले में पूर्व में दिए गए अन्य अंतरिम आदेश भी समाप्त कर दिए। साथ ही स्पष्ट किया कि सक्षम प्राधिकारी कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र रहेगा।

वनीकरण के लिए खरीदी थी जमीन


भास्करपारा कोल कंपनी लिमिटेड, इलेक्ट्रोथर्म (इंडिया) लिमिटेड और अल्ट्राटेक सीमेंट लिमिटेड का संयुक्त उपक्रम है, जिसे भास्करपारा कोल ब्लॉक में कोयला खनन के उद्देश्य से गठित किया गया था।कोल ब्लॉक में करीब 515 हेक्टेयर वन भूमि शामिल होने के कारण प्रतिपूरक वनीकरण के लिए जमीन की आवश्यकता थी। इसी सिलसिले में कंपनी ने सरगुजा के बैजनाथपुर (सहानपुर) में गया प्रसाद, बालगोविंद और सत्यनारायण से कुल 36.87 हेक्टेयर भूमि खरीदी थी।

याचिकाकर्ताओं के मुताबिक बाद में खरीदी गई भूमि का एक हिस्सा वन भूमि के रूप में चिह्नित होने पर उसमें से 10.04 हेक्टेयर जमीन संशोधन विलेख ( करेक्शन डीड) के जरिए वापस कर दी गई थी। याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मनोज परांजपे के साथ अधिवक्ता शिवांगी अग्रवाल ने पैरवी की। प्रतिवादियों की ओर से अधिवक्ता सीमा वर्मा और उत्तरा श्रीवास्तव तथा राज्य सरकार की ओर से शासकीय अधिवक्ता अविनाश सिंह ने पक्ष रखा।

हाईकोर्ट के इस फैसले ने राजस्व अधिकारियों और सिविल कोर्ट के अधिकार क्षेत्र की सीमा स्पष्ट करते हुए कहा है कि राजस्व प्रक्रिया की जांच और पंजीकृत दस्तावेज को निरस्त करना दो अलग-अलग कानूनी विषय हैं।

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