• अतुलकांत खरे
Diwali and Misconceptions : बिलासपुर
(fourthlire)। हमारे समाज में अंधविश्वास के कारण यह गलत धारणा फैली हुई है कि दीपावली की रात तांत्रिक क्रियाओं के तहत उल्लू की बलि देने या उनके अंगों खासकर पंख का उपयोग करने से धन-संपदा और मां लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है। छत्तीसगढ़ में बहुत सी भ्रांतियां चलती हैं और इनके चलते कुछ तांत्रिक क्रियाएं भी लोग करते हैं।
75 हजार तक कीमत, एक पंख 2 हजार का
दीपावली के पूर्व छत्तीसगढ़ के बहुत से गांवों में उल्लू पूजा का रिवाज है। पूजा की आड़ में कई लोग लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए उल्लू की बलि चढ़ा देते हैं और उसके पंख घर में रखते हैं।
बिलासपुर में आसपास हांफा ताला गांव ,बैमा और नागोई में दिवाली के एक माह पूर्व से ही ग्रामीण बच्चे उल्लू की तलाश में भटकते हैं क्योंकि उल्लू का एक पंख लगभग ₹2000 का बिकता है और पूरे उल्लू की कीमत लगभग 75000 तक जाती है।
आमतौर पर गौरैया और जंगली तोते पकड़ने निकलते है पर उल्लू हाथ लग जाए तो चांदी हो जाती है।

कम दिखाई देने लगे अब उल्लू
बैमा का .रेवा बताता है दीपावली के तीन दिन उल्लू पूजा के लिए महत्त्वपूर्ण माने जाते हैं। बिलासपुर के लोग उल्लू पूजा के लिए ‘तालागांव’ जाते हैं और इस समय काफी उल्लू मारे जाते हैं।
यहीं कारण है कि बिलासपुर के आसपास अब उल्लू यदा-कदा ही दिखाई देता है। वन रक्षक आर. एस. यादव बताते हैं, श्मशान, कब्रिस्तान, ऊंचे स्थान और कंदराओं में रहने वाला यह पक्षी शांत जीवन पसंद करता है पर शैतान की छाया उस पर मंडरा रही है।
अमावस्या की रात तरह-तरह के टोटके
अंधविश्वास के लिए श्मशान साधना में इस पक्षी का खुलकर उपयोग हो रहा है। हाल ही में बिलासपुर में कोनी में जलती चिता पर साधना करते हुए तांत्रिक और कुछ युवकों को गिरफ्तार किया गया था। यहां अंधविश्वास की जगह इतनी गहरी हैं। अमावस्या की रात को तरह-तरह के टोटके’किए जाते हैं। आज तक कभी और कहीं भी इसकी पुष्टि नहीं हुई है नहीं है कि उल्लू ने किसी पर हमला किया हो।
शोध के मुताबिक उल्लू का शरीर ऐसा है कि कोई काम नहीं आता। तांत्रिकों ने प्रेत और लक्ष्मी साधना के लिए इस पक्षीको को हथियार बना लिया है। इस पक्षी को लेकर सारी भ्रांतियां निर्मूल निकली हैं।
उल्लू हमारा दोस्त पक्षी
वास्तव में उल्लू दोस्त पक्षी है। ‘लक्ष्मी’ का वाहन उल्लू भगवान श्रीकृष्ण के मोर मुकुट में भी चमकता है, शास्त्रों में बताया गया है। इन दिनों उल्लू की 12 प्रजातियां मिलती हैं, जिनमें सबसे मजबूत ‘उल्लूक’ है। उल्लू चूहों का शिकार करके किसानों की मदद करते हैं। वन्य प्राणी विशेषज्ञ ए. बी. श्रीवास्तव बताते हैं, उल्लू आने वाली विपदा को भांप लेता है। भूकंप केन्द्रों में अब उल्लू भी पाले जाते हैं। बस्तर में उल्लू का मांस बड़े चाव से खाया जाता है। इसके पीछे ‘मर्दानगी’ बढ़ाने का तर्क भी है। एक वयस्क उल्लू 2 किलो वजन तक होता है। प्राणिशास्त्रियों के लिए उल्लू हमेशा उत्सुकता का विषय रहे हैं।
अचानकमार में 300 प्रजातियों के पक्षी
हाल ही में करगीरोड में एक बड़े आकार का उल्लू देखा गया था। बिलासपुर के पास अचानकमार अकेला अभयारण्य है, जहां 300 से ज्यादा प्रजातियों के पक्षी हैं। इनमें उल्लुओं की चार प्रजातियां भी हैं। बिलासपुर के लिए सौभाग्य है कि देश में पक्षियों का एक बड़ा खजाना अचानकमार में है। जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया, कोलकाता की टीम ने यहां उल्लुओं की विशेष चार प्रजातियां ‘वॉच’ की थी। पक्षी विशेषज्ञ एम. चितनपक्षी ने भी यहां कई दुर्लभ पक्षी देखे थे। कोरबा के आसपास के जंगलों में साधना करने वाले स्वामी अवधूत इन दोनों बिलासपुर आए हुए हैं वह हर वर्ष काली पूजा के लिए बिलासपुर आते हैं और काली साधना करते हैं।
उल्लुओं की बलि पर कार्रवाई हो
स्वामी अवधूत बताते हैं की उल्लू की बलि चुपचाप चलती रहती है । काफी पहले से उल्लू पकड़ने का सिलसिला चलता रहता है और उल्लू को ग्रामीण छुपा के रखते हैं और मौका मिलते ही अच्छी कीमत पर बेच देते हैं । उन्ह ₹50000 तक मिल जाते हैं। जंगल साधना के दौरान उन्होंने ग्रामीण बच्चों को कई बार इसे रोकने की कोशिश की है। ग्रामीण बच्चे पेड़ों पर चढ़कर फंदा लगाकर जाल लगाकर उल्लू पकड़ते हैं।
जनजागरण भी जरूरी
पक्षियों के जानकार अमित मिश्रा बताते हैं
अंधविश्वासों पर लगाम लगाने के लिए लंबे जनजागरण अभियानों की जरूरत है ।ताकि निरीह पक्षियों की बलि रोकी जाए। इन दिनों वास्तु का पूरे विश्व में जोर है लेकिन वास्तुविदों ने सि शव
र्फ हंस और बतख को शामिल किया है, वो भी सिर्फ तस्वीरें। देश के प्रख्यात पक्षी विशेषज्ञ डॉ . सलीम अली की किताबों में भी छत्तीसगढ़ की उलूक साधना का जिक्र मिलता है ‘उल्लू’ से लक्ष्मी सिद्धि सिर्फ भरमाने वाले कुछ तांत्रिकों की सोच है। ऐसे तांत्रिकों पर वन संरक्षण अधिनियम के तहत कार्रवाई होना चाहिए। या धन-संपत्ति मिलने से कोई संबंध नहीं है।
क्या है यह अंधविश्वास?
धन की लालसा ज्यादा.. कई लोग और तांत्रिक यह मानते हैं कि दीपावली की रात मां लक्ष्मी के वाहन (उल्लू) की बलि देने या उसके अंगों (पंख, आंख, हड्डी, खून आदि) का तंत्र-मंत्र में उपयोग करने से अपार धन और समृद्धि हमेशा के लिए उनके पास रुक जाएगी। अंधविश्वास के तहत तांत्रिक उल्लू को नशीला पदार्थ पिलाकर या बलि देकर वशीकरण और मारण जैसी क्रियाएं करवाते हैं, जिसका कोई वैज्ञानिक या धार्मिक आधार नहीं है। धर्म और शास्त्रों का मत: धर्माचार्यों और पंडितों के अनुसार हिंदू धर्म में मां लक्ष्मी की पूजा सुख-शांति और सद्बुद्धि के लिए होती है। बिलासपुर के पंडित प्रमोद पाठक बताते हैं शास्त्रों में किसी भी जीव की बलि देना पूरी तरह निषिद्ध है और इससे केवल दरिद्रता आती है।
पर्यावरणीय नुकसान और कानून
कानन पेंडारी के डॉ . पी के दुबे के मुताबिक भारत में उल्लू की सभी प्रजातियाँ वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के तहत पूरी तरह सुरक्षित हैं। उल्लू का शिकार करना, उन्हें पकड़ना, मारना, बेचना या उनके अंगों का इस्तेमाल करना एक गंभीर अपराध है, जिसमें जेल और भारी जुर्माने का प्रावधान है। और उल्लू के पंख आजकल ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों जगह मिलते हैं। आध्यात्मिक, ज्योतिषीय उपायों (जैसे तंत्र-मंत्र, वास्तु दोष निवारण या लक्ष्मी पूजा) और क्राफ्ट के लिए लोग इनका उपयोग करते हैं।
ऑनलाइन खरीदना बहुत आसान
जहाँ कई ई-कॉमर्स और धार्मिक स्टोर्स इन्हें प्रामाणिकता के सर्टिफिकेट के साथ विक्रय करते हैं । धार्मिक और आध्यात्मिक वेबसाइट्स और स्पेशलाइज्ड ऑनलाइन स्टोर्स पर ‘Natural Owl Feather’ आसानी से मिल जाते हैं। यहाँ बिना पूजा किए (Non-energised) पंख लगभग ₹1,100 में और पंडित जी द्वारा अभिमंत्रित (Energised) पंख ₹1,400 से ₹1,500 के बीच मिलते हैं। बिलासपुर के चांटी डीह में थोड़ी सी खोजबीन करने पर आसानी से उल्लू के पंख उपलब्ध करा दिए जाते हैं । अंधविश्वास का यह सिलसिला अनवरत चल रहा है ।




